भारत ने कार्टोसैट-3 कक्षा में स्थापित कर 310 विदेशी उपग्रह छोड़ने का बनाया रिकॉर्ड

भारत (India) ने बुधवार को अपना पृथ्वी अवलोकन उपग्रह कार्टोसैट-3 तथा अमेरिका के 13 नैनो उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया. इसके साथ ही भारत ने 300 विदेशी उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने का आंकड़ा पार कर लिया है. अमेरिका के 13 सूक्ष्म उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित करने के साथ ही आज की तारीख तक भारत द्वारा छोड़े गए कुल विदेशी उपग्रहों की संख्या 310 हो गई है. इसबीच भारत का नया पृथ्वी अवलोकन उपग्रह कार्टोसैट-3 शहरी योजना, ग्रामीण संसाधन और ढांचागत विकास, तटीय भूमि के उपयोग और लैंड कवर तथा सामरिक और रक्षा उद्देश्यों के लिए भी अधिक स्पष्ट तस्वीरें भेजेगा.

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के अधिकारियों ने कहा कि वे विभिन्न एजेंसियों के लिए जरूरी तस्वीरें भेजेंगे. तस्वीर के उपयोग का निर्णय एजेंसी लेगी. उपग्रह द्वारा ली जाने वाली तस्वीरों का उपयोग निगरानी के उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है. इसरो ने हालांकि इस संबंध में कोई बयान नहीं दिया है. उपग्रह पेलोड्स में 0.25 मीटर ग्राउंड रिजोल्यूशन तक की तस्वीर पैंक्रोमेटिक में या 16 किलोमीटर के चार बैंड मल्टीस्पैक्ट्रल मोड्स में ग्राउंड सैंपल डिस्टेंस (जीएसडी) में लेने की क्षमता है.

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कहा कि काटरेसैट-3 में कई नई तकनीकों का उपयोग किया गया है. इनमें अधिक फुर्तीले स्ट्रक्चरल प्लेटफॉर्म, पेलोड प्लेटफॉर्म, डेटा हैंडलिंग और ट्रांसमिशन सिस्टम की उच्च दर, उन्नत ऑनबोर्ड कम्प्यूटर और नई पॉवर इलेक्ट्रॉनिक्स, ड्यूअल गिम्बल एंटीना और अन्य हैं. इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने कहा, “यह घोषणा करते हुए बहुत खुशी हो रही है कि पीएलएलवी-सी47 ने कार्टोसैट-3 और 13 अमेरिकी उपग्रहों को उनकी कक्षाओं में स्थापित कर दिया है. कार्टोसैट-3 इसरो द्वारा अब तक बनाया गया भारत का उच्च रिजोल्यूशन का सिविलियन यान है.”

उन्होंने कहा कि इसरो ने इस वित्त वर्ष में 13 मिशनों की योजना बनाई है. इसके अंतर्गत मार्च 2020 से पहले छह लॉन्च व्हीकल मिशन और सात उपग्रह मिशन हैं. लगभग 44.4 मीटर लंबा और लगभग 320 टन वजनी ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान-एक्सएल (पीएसएलवी-एक्सएल) को सुबह लगभग 9.28 बजे एकतरफा अंतरिक्ष यात्रा के लिए छोड़ा गया. उड़ान के लगभग 17 मिनट बाद रॉकेट ने काटरेसैट-3 को 509 किलोमीटर ऊंचाई पर स्थित उसकी कक्षा में और 97.5 डिग्री झुकाव पर छोड़ दिया.

इसके तुरंत बाद अमेरिकी उपग्रहों में से पहला उपग्रह कक्षा में स्थापित कर दिया गया. अंतिम सूक्ष्म उपग्रह रॉकेट के प्रक्षेपित किए जाने के लगभग 27 मिनट बाद रॉकेट से अलग हो गया. इसरो के अनुसार, अमेरिका के 12 सूक्ष्म उपग्रहों के नाम फ्लोक-4पी है, और वे पृथ्वी अवलोकन उपग्रह हैं, जबकि 13वां उपग्रह मेशबेड एक कम्यूनिकेशन टेस्ट बेड उपग्रह है. पीएसएलवी-एक्सएल वैकल्पिक रूप से ठोस और तरह ईंधन से लैस चार चरण के इंजन वाला एक्सपेंडेबल रॉकेट है. रॉकेट में छह स्ट्रैप-ऑन बूस्टर मोटर्स हैं, जो उड़ान के शुरुआती चरण में अतिरिक्त ताकत लगाते हैं.

ISRO ने PSLV-C47 के जरिए लॉन्च किया ‘कार्टोसैट-3’ इमेज सैटेलाइट, सेना के लिए मददगार साबित होगा

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने बुधवार सुबह पृथ्वी (Earth) की तस्वीरें लेने वाले सैटेलाइट कार्टोसेट-3 (Cartosat-3) और अमेरिका (United States) के 13 कमर्शियल नैनो सैटेलाइट्स (Nano-Satellites) को पीएसएलवी-सी47 (PSLV-C47) के जरिए आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा (Sriharikota) स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर शार (Satish Dhawan Space Centre Shar) से लॉन्च किया. पीएसएलवी-सी47 ने बुधवार सुबह 9.28 बजे कार्टोसेट-3 और 13 कमर्शियल नैनो सैटेलाइट्स के साथ अंतरिक्ष के लिए प्रस्थान किया और इसके लिए उल्टी गिनती मंगलवार सुबह 7.28 बजे शुरू हुई थी.

इसरो द्वारा किए गए एक ट्वीट के अनुसार, पीएसएलवी-सी47 एक्सएल कन्फीगरेशन में पीएसएलवी की यह 21वीं उड़ान है. यह श्रीहरिकोटा स्थित एसडीएससी शार से 74वां प्रक्षेपण यान मिशन है. यह भी पढ़ें- Chandrayaan 2: इसरो ने चंद्रमा की सतह की पहली जगमग तस्वीर जारी की.

बता दें कि कार्टोसेट-3 सैटेलाइट उच्च गुणवत्ता की तस्वीरें लेने की क्षमता से लैस तीसरी पीढ़ी का उन्नत सैटेलाइट है. यह 509 किलोमीटर ऊंचाई पर स्थित कक्षा में 97.5 डिग्री पर स्थापित होगा. भारतीय अंतरिक्ष विभाग के न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के साथ हुए एक समझौते के तहत पीएसएलवी अपने साथ अमेरिका के 13 नैनो सैटेलाइट्स को भी लेकर गया है.

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उल्लेखनीय है कि इसरो प्रमुख के सिवन ने भारत के सैटेलाइट ‘कार्टोसैट-3’ के लॉन्च से पहले मंगलवार को तिरुपति स्थित तिरुमाला मंदिर में पूजा-अर्चना की. सिवन ने तिरुपति के तिरुमाला में भगवान वेंकटेश की पूजा-अर्चना की.

ISRO 27 नवंबर को लॉन्च करेगा काटरेसैट-3 और 13 अमेरिकी उपग्रह

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation) ने गुरुवार को कहा कि उसने काटरेसैट-3 (Cartosat-3) उपग्रह और 13 वाणिज्यिक नैनो उपग्रहों (Satellite) को पीएसएलवी रॉकेट से अंतरिक्ष में छोड़ने का कार्यक्रम दो दिन आगे बढ़ा दिया है, और अब ये उपग्रह 27 नवंबर को छोड़े जाएंगे. इसरो के अनुसार, काटरेसैट-3 व अमेरिका के 13 नैनो उपग्रहों को ले जाने वाले पीएसएलवी-एक्सएल वैरियंट को अब 27 नवंबर को सुबह 9.28 बजे छोड़ा जाएगा.

पीएसएलवी-एक्सएल वैरियंट को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा रॉकेट पोर्ट से लॉन्च किया जाएगा. इससे पहले इसरो ने कहा था रॉकेट 25 नवंबर को सुबह 9.28 बजे लॉन्च किया जाएगा. काटरेसैट-3 उपग्रह तीसरी पीढ़ी का उन्नत उपग्रह है, जिसमें हाई रिजोल्यूशन की इमेजिंग क्षमता है.

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उपग्रह को 97.5 डिग्री के झुकाव पर 509 किमी की कक्षा में स्थापित किया जाएगा. इसरो के अनुसार, अमेरिका के 13 नैनो उपग्रह न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के साथ वाणिज्यिक व्यवस्था का एक हिस्सा हैं. एनएसआईएल कंपनी हाल ही में अंतरिक्ष विभाग के तहत स्थापित की गई है.

भारतीयों के दिमाग का आकार पश्चिमी-पूर्वी देशों की तुलना में है छोटा, मानव मस्तिष्क को लेकर अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा

हैदराबाद: भारतीय (Indians) भले ही अपने आपको कितना ही दिमाग वाला क्यों न समझते हों, लेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन (Study) में भारतीयों के मस्तिष्क (Indian Brain) को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. दरअसल, हैदराबाद (Hyderabad) स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (International institute of Information Technology) के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि पश्चिमी और पूर्वी देशों के लोगों की तुलना में भारतीयों के दिमाग का आकार छोटा है. इस अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी और पूर्वी देशों के लोगों की तुलना में औसत रूप से भारतीयों के दिमाग की लंबाई, चौड़ाई और भार में कमी पाई गई है.

द टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, हैदराबाद के इस संस्थान ने भारतीय दिमाग का एक एटलस तैयार किया है, जिसकी मदद से अल्जाइमर और मस्तिष्क से जुड़ी अन्य गंभीर बीमारियों का जल्दी पता लगाया जा सकेगा. इस अध्ययन की रिपोर्ट तंत्रिका-विज्ञान(न्यूरोलॉजी) की मेडिकल जर्नल न्यूरोलॉजी इंडिया (Neurology India) में प्रकाशित हुई है.

सेंटर फॉर विजुअल इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी (Centre for Visual Information Technology) में कार्यरत जयंती सिवास्वामी (Jayanthi Sivaswamy) इस अध्ययन से जुड़ी हुई हैं. उनका कहना है मॉन्ट्रियल न्यूरोलॉजिकल इंस्टीट्यूट (Montreal Neurological Institute-MNI) टेम्पलेट, जिसका इस्तेमाल मानक के तौर पर किया जाता है. इसे कोकेशियान दिमाग (Caucasian Brains) की मदद से विकसित किया गया था. शोधकर्ताओं के अनुसार. यह भारतीयों में दिमाग संबंधी अंतर का विश्लेषण करने के लिए आइडियल पैटर्न नहीं है. यह भी पढ़ें: World Alzheimer’s Day 2019: आज है वर्ल्ड अल्जाइमर डे, क्या है ये बीमारी? जानिए इसके लक्षण और बचाव के तरीके

उन्होंने कहा कि एमएनआई की तुलना में भारतीयों का दिमाग छोटा होता है और स्कैन के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं वो चिंताजनक है. जयंती सिवास्वामी के मुताबिक, चीनी और कोरियन दिमागी टेम्पलेट भी विकसित जा चुके है, लेकिन भारतीयों के लिए अब तक कोई ऐसा टेम्पलेट विकसित नहीं किया गया था.

गौरतलब है कि हैदराबाद स्थित आईआईआईटी (IIIT-H) की टीम मे भारतीयों के दिमाग के टेम्पलेट को विकसित करने की दिशा में पहला प्रयास किया है. दिमाग के इस इस एटलस को तैयार करने के लिए 50 महिलाओं और 50 पुरुषों का एमआरआई किया गया. इस दौरान किसी भी तरह की अनियमितता या गड़बड़ी से बचने के लिए तीन अलग-अलग अस्पतालों में तीन अलग-अलग स्कैन किए गए.

Chandrayaan 2 के विक्रम लैंडर को लेकर आया नया अपडेट, NASA ने कही ये बात

विक्रम लैंडर को लेकर अंतरिक्ष एजेंसी नासा का एक बयान आया है. उन्होंने अपने बयान में कहा है कि चंद्रमा क्षेत्र के पास से हाल में गुजरे उसके चंद्रमा ऑर्बिटर द्वारा कैद की गई तस्वीरों में चंद्रयान-2 (Chandrayaan 2) के विक्रम लैंडर का कोई सुराग नहीं मिला है.यह ऑर्बिटर चंद्रमा के उस क्षेत्र से गुजरा था जहां भारत के महत्त्वाकांक्षी मिशन ‘चंद्रयान-2’ ने सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास किया था. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सात सितंबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयास किया था लेकिन लैंडर से संपर्क टूट जाने के बाद से उसका कुछ पता नहीं चल सका है.

लूनर रिकॉनसन्स ऑर्बिटर (एलआरओ) के परियोजना वैज्ञानिक नोआह एडवर्ड पेट्रो ने ई-मेल के जरिए विशेष बातचीत में पीटीआई-भाषा को बताया, “एलआरओ मिशन ने 14 अक्टूबर को चंद्रयान-2 विक्रम लैंडर के उतरने वाले स्थान के क्षेत्र की तस्वीरों को कैद किया लेकिन उसे लैंडर का कोई सुराग नहीं मिला.” पीट्रो ने बताया कि कैमरा टीम ने बहुत ध्यान से इन तस्वीरों का अध्ययन किया और बदलाव का पता लगाने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जिसमें लैंडिग की कोशिश से पहले की तस्वीर और 14 अक्टूबर को ली गई तस्वीर के बीच तुलना की गई. यह भी पढ़े: Chandrayaan 2: इसरो चीफ के सिवन ने कहा- विक्रम लैंडर से कोई संपर्क नहीं, ऑर्बिटर कर रहा है अपना काम, अब गगनयान मिशन हमारी प्राथमिकता

एलआरओ मिशन परियोजना के उप वैज्ञानिक जॉन केलर ने पीटीआई-भाषा को बताया, ‘‘ यह संभव है कि विक्रम किसी छाया में छिपा हो या फिर जिस क्षेत्र में हमने उसे खोजा, वहां पर वह नहीं हो। यह क्षेत्र कभी भी छाया से पूरी तरह से मुक्त नहीं होता है.’’ इससे पहले 17 अक्टूबर को किए गए एक मिशन में भी एलआरओ टीम को लैंडर की तस्वीर लेने या उसका पता लगाने में कामयाबी नहीं मिली थी.

Chandrayaan 2: इसरो ने चंद्रमा की सतह की पहली जगमग तस्वीर जारी की

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने गुरुवार को चंद्रयान 2 (Chandrayaan 2) के आईआईआरएस (IIRS) पेलोड द्वारा ली गई चंद्रमा के सतह (Lunar Surface) की पहली जगमग तस्वीर जारी की है. इसरो ने अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से इस तस्वीर को शेयर करते हुए बताया है कि आईआईआरएस को इस तरह से डिजाइन किया गया है जिससे वह चंद्रमा की सतह से नैरो और कॉन्टिगुअस स्पेक्ट्रल चैनल (Narrow and Contiguous Spectral Channels) में रिफलेक्टेड सनलाइट (Reflected Sunlight) को माप सके. यह तस्वीर उत्तरी गोलार्ध में चंद्रमा के उस पार के हिस्से को कवर करती है.

इससे पहले इसरो ने अक्टूबर के पहले हफ्ते में चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर स्थित ऑर्बिटर हाई रिजोल्यूशन कैमरा (ओएचआरसी) द्वारा ली गईं चंद्रमा की सतह की तस्वीरें जारी की थी. इस दौरान इसरो ने बताया था किऑर्बिटर ने चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर की ऊंचाई से ली गईं ये तस्वीरें चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में स्थित बोगस्लावस्की ई क्रेटर और उसके आस-पास की हैं. इसका व्यास 14 किलोमीटर और गहराई तीन किलोमीटर है. यह भी पढ़ें- पूर्व इसरो प्रमुख किरण कुमार बोले, ‘चंद्रयान-2’ का ऑर्बिटर ‘‘बेहतर परिणाम’’ हासिल करने में सक्षम.

इसरो का ट्वीट-

इसरो ने कहा था कि तस्वीरों में चंद्रमा पर बड़े पत्थर और छोटे गड्ढे दिख रहे हैं. गौरतलब है कि इसरो के चंद्रयान-2 के विक्रम मॉड्यूल का सात सितंबर को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयास तय योजना के मुताबिक पूरा नहीं हो पाया था. लैंडर का आखिरी क्षण में जमीनी केंद्रों से संपर्क टूट गया था.

जोसेफ एंटोनी फर्डिनेंड प्लैटो की 218वीं जयंती पर Google ने खास Doodle बनाकर किया उन्हें याद, जानें कौन थे Joseph Antoine Ferdinand Plateau

Joseph Antoine Ferdinand Plateau 218th Birth Anniversary: आज का Google Doodle बेल्जियन के भौतिक वैज्ञानिक (Belgian Physicist) जोसेफ एंटोनी फर्डिनेंड प्लैटो की 218वीं जयंती पर समर्पित है. वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1832 में फेनाकिस्टिस्कोप (Phenakistiscope) का आविष्कार किया था. ये एक ऐसा उपकरण था, जिसकी वजह से सिनेमा का जन्म हुआ था. इस उपकरण से चलते इमेज का इल्यूजन बनता था, जिसे पर्दे पर फिल्म के रूप में देखा जाता था. यह एक प्रकार का एनीमेशन डिवाइस है, जिसका इस्तेमाल सबसे पहले मोशन पिक्चर के लिए किया गया था. मनोरंजन जगत में आज जो भी बेहतरीन फिल्मों का निर्माण हो रहा है उसमें मूविंग मीडिया एंटरटेनमेंट में सबसे पहले इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. गूगल ने एनिमेटेड डिस्क से प्रेरित होकर आज का खास डूडल आर्ट बनाया है, जिसमें विभिन्न डिवाइस दिखाई दे रहे हैं और अलग-अलग इमेजिनरी थीम भी है.

आज के इस ख़ास डूडल को एनिमेटेड फिल्ममेकर डूडलर ओलिविया ह्योनह (Olivia Huynh) ने डायना ट्रान (Diana Tran) और टॉम तबानाओ (Tom Tabanao) की मदद से बनाया है. 14 अक्टूबर 1801 में बेल्जियन के ब्रसेल्स में जन्में जोसेफ अपने पिता के इकलौते बेटे थे. उनके पिता भी एक कलाकार थे जो फूलों में पेंटिंग का काम करते थे. जोसेफ ने 1829 में भौतिक और गणितीय विज्ञान (Physical And Mathematical Sciences ) में डॉक्टर के रूप में स्नातक किया, 1827 में ब्रुसेल्स में गणित पढ़ाया और बाद में 1835 में उन्हें गेंट विश्वविद्यालय (Ghent University) में भौतिकी और अनुप्रयुक्त भौतिकी (Physics and Applied Physics) का प्रोफेसर नियुक्त किया गया.

जिसके बाद जोसेफ एंटोनी फर्डिनेंड प्लैटो ने अपनी रिसर्च शुरू की और विशेष तौर पर ह्यूमन रेटिना पर रंगों के प्रभाव का अध्ययन किया. उन्होंने इस पर गहन अध्ययन किया कि रेटिना किस प्रकार से काम करता है, उस पर किस प्रकार चित्र बनते हैं. इन्हीं सब चीजों पर गहन अध्ययन कर उन्होंने 1832 में स्ट्रॉबोस्कोपिक डिवाइस का निर्माण किया.

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लॉ की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्लैटो उन्नीसवीं सदी के सबसे बेस्ट बेल्जियन साइंटिस्ट कहे जाने लगे. उन्होंने फिजियोलॉजिकल ऑप्टिक्स में महारत हासिल की थी. आगे चलकर प्लैटो के आंखों की रौशनी चली गई थी, जिसके बाद भी वो विज्ञान के क्षेत्र में अपन योगदान देते रहे और इस योगदान में उनके बेटों ने भी उनका साथ दिया.

चंद्रयान-2: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने ‘ओआरएचसी’ द्वारा ली गईं चंद्रमा सतह की तस्वीरें कीं जारी

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation) ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर स्थित ऑर्बिटर हाई रिजोल्यूशन कैमरा (OHRC) द्वारा ली गईं चंद्रमा की सतह की तस्वीरें जारी की हैं. इसरो के अनुसार, ऑर्बिटर ने चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर की ऊंचाई से ली गईं ये तस्वीरें चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में स्थित बोगस्लावस्की ई क्रेटर और उसके आस-पास की हैं.

इसका व्यास 14 किलोमीटर और गहराई तीन किलोमीटर है. इसरो ने कहा कि तस्वीरों में चंद्रमा पर बड़े पत्थर और छोटे गड्ढे दिख रहे हैं.

चंद्रमा सतह

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बता दें कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने चंद्रमा ऑर्बिटर द्वारा चांद के उस हिस्से की खींची गई तस्वीरों का विश्लेषण, प्रमाणन एवं समीक्षा कर रहा है जहां भारत के चंद्रयान-2 मिशन ने अपने विक्रम मॉड्यूल की सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयास किया था.

डॉ. हर्बर्ट क्लेबेर की याद में Google ने बनाया ख़ास Doodle, जानें कौन थे Dr. Herbert Kleber

Dr. Herbert Kleber Birthday: Google ने नशे की लत छुड़ाने वाले मनोवैज्ञानिक डॉ. हर्बर्ट डेविड क्लेबेर (Dr. Herbert Kleber) के अविश्वसनीय काम को ख़ास डूडल बनाकर याद किया है. इस डूडल को मैसाचुसेट्स के कलाकार जैरेट जे. क्रोसोज्का ने बनाया है. डूडल में एक डॉक्टर दिखाई दे रहा है. दूसरी तरफ एक मरीज बैठा हुआ है, जिसकी समस्या को डॉक्टर एक नोट पैड पर लिख रहे हैं. मरीज के पीछे कुछ चित्र हैं जिसमें व्यक्ति को नशे की लत से बाहर निकलते दिखाया गया है. आज ही के दिन नशे के इलाज के लिए नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिसिन में उनका चुनाव हुआ था, आज उनके चुनाव की 23वीं वर्षगांठ है. डॉ. हर्बट क्लेबेर की मृत्यु पिछले साल ही हुई है, उनका जन्म 19 जून 1934 को पेंसिल्वेनिया के पिट्सबर्ग में हुआ था. उनके पिता जो कभी खुद डॉक्टर बनना चाहते थे, वो चाहते थे कि क्लेबेर डार्टमाउथ कॉलेज में पढ़े, जहां उन्होंने प्री-मेड का अध्ययन किया और मनोविज्ञान में उनके जुनून की खोज की.

डॉ. हर्बट क्लेबेर का मनोविज्ञान में जूनून वास्तव में तब शुरू हुआ जब उन्हें केंटुकी में नशे की लत वाले कैदियों के इलाज की जिम्मेदारी दी गई, जिसके बाद उन्हें इस स्थिति का सफलतापूर्वक इलाज करने के लिए साइंटिफिक अप्रोच की जरूरत थी, क्योंकि वर्तमान मेथेड के आने के कुछ ही समय बाद रोगियों के बहुमत को देखा, जिसके बाद डॉ. हर्बट क्लेबेर ने एक ऐसी विधि का इजात किया जिसे “सबूत-आधारित उपचार” (“evidence-based treatment”,) कहा, गया. जो कि नशे की लत के रास्ते को बदलने के लिए अनुसंधान और विज्ञान पर निर्भर था. अपने समय के कई डॉक्टरों के विपरीत, डॉ. हर्बट क्लेबेर ने नशे को एक नैतिक विफलता के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक ऐसी स्थिति के रूप में देखा, जिसका इलाज केवल अनुसंधान, दवा और चिकित्सा के माध्यम से किया जा सकता था.

उनके काम को राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश (President George H W Bush ) ने मान्यता दी थी.

डॉ. हर्बट क्लेबेर की सफलता ने अंततः राष्ट्रपति बुश का ध्यान आकर्षित किया, जिन्होंने मनोचिकित्सक को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियंत्रण नीति कार्यालय में मांग में कमी के लिए उप निदेशक नियुक्त किया. डॉ. हर्बट क्लेबेर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय के अनुसार, “रोकथाम, शिक्षा और उपचार में कार्यक्रमों के माध्यम से अवैध दवाओं की मांग में कमी” के कारण नीतियों को लागू किया. उन्होंने नशे के इलाज के उद्देश्य से विभिन्न केंद्रों की स्थापना की और इस विषय पर कई पत्र लिखे. लत और मादक द्रव्यों के सेवन पर राष्ट्रीय केंद्र के सह-संस्थापक के अलावा, डॉ. हर्बट और उनकी तत्कालीन पत्नी डॉ. मैरियन डब्ल्यू फिशमैन ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ फिजिशियन और सर्जन में मादक द्रव्यों के सेवन पर डिवीजन की स्थापना की, जो बाद में सबसे बड़ी बन गई.

1996 मे डॉ. हर्बट क्लेबेर को नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन का सदस्य चुना गया. 84 वर्ष की आयु में मरने से पहले डॉ. हर्बट क्लेबेर ने नशे के उपचार पर 250 से अधिक पत्र और कई पुस्तकें लिखीं.

शास्त्रीय गायक पंडित जसराज को NASA ने दिया बड़ा सम्मान, उनके नाम पर हुआ ग्रह का नामकरण- बने पहले भारतीय कलाकार

NASA ने अपने खगोलविद और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 11 नवम्बर 2006 को खोजे गए एक ग्रह (Minor planet ) का नामकरण पद्म विभूषण पंडित जसराज (Pandit Jasraj) के नाम पर किया है. अंतरिक्ष में मिला यह ग्रह मंगल और बृहस्पति (Mars and Jupiter) के बीच स्थित है. माइनर प्लेनेट वह ग्रह होते हैं जो न तो ग्रह हैं और न ही इन्हें पूरी तरह से धूमकेतु कहा जा सकता है. पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हुआ था. इसी के आधार इस ग्रह का नामकरण 300128 किया गया है. जो कि उनके जन्मदिन का उल्टा है. इस बात की जानकारी पंडित जसराज की बेटी दुर्गा जसराज ने इस सम्मान की जानकारी दी. नासा और खगोलविद और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने 23 सितंबर को नामकरण की ये घोषणा की.

बता दें कि आईएयू (IAU) ने 23 सितंबर 2019 को घोषणा की और प्रतीक चिन्ह मुंबई स्थित पंडित जसराज के आवास पर पहुंचाया. इसमें कहा गया है संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय गायन के पुरोधा हैं. संगीत को अपना जीवन समर्पित करने वाले जसराज को कई सम्मान मिले हैं. यह सम्मान पाने वाले पंडित जसराज पहले भारतीय संगीतकार हैं. पद्म विभूषण पंडित जसराज पिछले आठ दशक से संगीत साधना में जुटे मेवात घराने के सशक्त स्तंभ हैं. इससे पहले मोजार्ट बीथोवन और टेनर लूसियानो पावारोत्ति को यह सम्मान मिल चुका है.

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गौरतलब हो कि भारत सरकार ने भी पंडित जसराज की संगीत सेवाओं के लिए उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री से सम्मानित किया है. इसके साथ ही पंडित जसराज को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड, लता मंगेशकर पुरस्कार, महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार भी मिल चुका है.