DRDO Pune: अब देश के दुश्मनों की खैर नहीं, 45 किलोमीटर तक मारक क्षमतावाली स्वदेशी माऊंटेड गन से बढ़ेगी सेना की ताकत -वीडियो

आत्मनिर्भर भारत के तहत DRDO Pune में स्वदेशी विकसित माऊंटेड आर्टिलरी गन से देश कि सेना की ताकत बढ़ेगी. इस गन में जो तकनीक है , वो फ़्रांस और इजराइल से भी बेहतर होने का दावा वैज्ञानिक कर रहें हैं.डीआरडीओ के वैज्ञानिक शैलेश गावलकर का कहना हैं कि स्वदेशी माउंटेड गन सिस्टम फ्रांसीसी, इजरायली और अन्य हॉवित्जर तोपों की तुलना में काफी बेहतर है. गावलकर ने बताया कि इस गन कि रेंज 45 किलोमीटर तक है और प्रति मिनट इसमें 5 से 6 राउंड मारे जा सकते है.

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सांपों के विकास की कहानी है बेहद रोचक, नए शोध में चौकाने वाली बातें आई सामने

सांपों की उत्पत्ति करीब 12 करोड़ साल पहले हुई थी. तब से उन्होंने इतनी तेजी से विकास किया है जितना बहुत कम जीवों ने किया होगा. एक नए शोध ने पता लगाया है कि आखिर सांपों को विकास में इतनी बढ़त मिली कैसे.सांप पहली बार डायनासोरों के युग में सामने आए थे और तब से उन्होंने विकास की एक सफल कहानी लिखी है. महासागरों से लेकर पेड़ों की चोटी तक, वो धरती पर हर किस्म के प्राकृतिक वास में पाए जाते हैं.

अब एक नए शोध ने पता लगाया है कि चार पैरों पर चलने वाली छिपकलियों से निकले इन जीवों को विकास की दौड़ में दूसरों के मुकाबले बढ़त कैसे मिली. वैज्ञानिकों ने सांपों और छिपकलियों की करीब 1,000 नस्लों के जीनोमिक डाटा की मदद से दोनों का एक व्यापक “इवोल्यूशनरी ट्री” बनाया.

साथ ही उपलब्ध जीवाश्म रिकॉर्ड भी देखा और सांपों के भोजन, खोपड़ी की बनावट, प्रजनन संबंधी जीवविज्ञान और भौगोलिक क्षेत्र का भी अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि सांपों में उनके शुरुआती इतिहास के समय में ही अचानक काफी इनोवेशन हुई और मुमकिन है कि उन्होंने अपनी कजिन छिपकलियों के मुकाबले तीन से लेकर पांच गुना ज्यादा तेज विकास किया.

मिशिगन विश्वविद्यालय के जीव-वैज्ञानिक डैनिएल रैबोस्की कहते हैं, “ये ऐसे है जैसे मानिए छिपकलियां विकास की एक मोपेड या गो-कार्ट पर धीरे धीरे चल रही हैं और सांप एक वी12 लेम्बोर्गिनी पर सवार हैं. छिपकलियां शहर वाली बस पर सवार हैं और सांप जैव विकास की बुलेट ट्रेन पर.” यह अध्ययन गुरुवार को विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ में छपा और रैबोस्की इसके वरिष्ठ लेखक हैं.

असरदार परभक्षी बनने के लिए

सांपों की उत्पत्ति करीब 12 करोड़ साल पहले हुई. जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय में इवोल्यूशनरी जीव-वैज्ञानिक और अध्ययन के सह-लेखक आर एलेग्जेंडर पाइरॉन ने बताया कि शुरुआती सांपों के पश्चक (वेस्टीजियल) हाथ-पैरथे और सबसे पुराना पूरी तरह से बिना हाथ-पैरों वाला सांप करीब 8.5 करोड़ साल पहले पाया जाता था.

अध्ययन में यह भी पता चला कि शुरुआती सांपों ने अपनी बनावट को महत्वपूर्ण तरीकों से बदला, अधिकांश रूप से बेहद विशिष्ट परभक्षी बनने के लिए. उनकी खोपड़ियां बेहद लचीली हो गईं ताकि वो अपने शिकार को बेहतर पकड़ सकें और निगल सकें.

उन्होंने एक शिकार का पता लगाने की भी एक प्रभावशाली प्रणाली विकसित की, जिसके तहत उनकी सूंघने की शक्ति परिष्कृत हो गई. कुछ सांपों से इंफ्रारेड देखने की क्षमता भी विकसित कर ली, जो एक तरह हीट सेंसर्स का काम करती है. कुछ सांप जहरीले हो गए.

शोधकर्ताओं ने सांपों और छिपकलियों के भोजन पर बड़े डाटासेट इकठ्ठा किए, जिसमें संग्रहालयों से मिले मृत नमूनों के पेट में मिली सामग्री पर मूल्यवान जानकारी भी शामिल है.

रैबोस्की कहते हैं, “छिपकलियां अमूमन कीड़े, मकड़े जैसे चीजें खाती हैं. कभी कभी पौधे भी. सांप असल में भोजन के मामले में एक्सट्रीम स्पेशलिस्ट होते हैं और अमूमन या तो हड्डीवाले जानवर या अजीब, खाने में मुश्किल, बिना हड्डी वाले जीव खाते हैं. जब सांप बिना हड्डी वाले जीव नहीं खाते हैं, तो वो अक्सर जहरीले कनखजूरे और बिच्छू जैसी खतरनाक चीजें या घिनौने घोंघे और वैसे अन्य जीव खाते हैं.”

छिपकलियों के कई समूह समय के साथ बिना हाथ-पैर वाले हो गए हैं लेकिन उनमें कई भी वैसी विकास संबंधी समृद्धि नहीं आई जैसी सांपों में आई.

अवसरों का फायदा उठाया

रैबोस्की ने बताया, “सांप उन दूसरी छिपकलियों से बेहद अलग हैं जो अंडे नहीं देतीं. ऐसी अधिकांश छिपकलियां मिट्टी या रेत में घर बनाती हैं या मुमकिन है वो घास में रेंगती हों. सांप महासगार में मूंगे की चट्टानों में गहरे गोते लगाने से लेकर पेड़ों पर बेहद तेजी से चढ़ने तक, सब कुछ करते हैं.”

पाइरॉन ने बताया सांपों में विकास का और तेज पड़ाव करीब 9 से 11 करोड़ सालों के बीच आया. उसके बाद फिर से 6.6 करोड़ साल पहले जब एक क्षुद्रग्रह के टकराने की वजह से डायनासोर खत्म हो गए, उसके बाद से कई बार अचानक विकास के ऐसे पड़ाव आए.

रैबोस्की ने यह भी कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि चूंकि साप इनोवेशन में (जल्दी नए गुण विकसित करने में) इतने अच्छे थे, इस वजह से वो सामने आने वाले इकोलॉजिकल अवसरों का फायदा उठा पाए, जैसे की 6.6 करोड़ साल पहले का वो मस एक्सटिंक्शन जिसने कई दूसरी प्रजातियों को खत्म ही कर दिया.”

सबसे छोटे जीवित सांपों में से हैं थ्रेडस्नेक, जो करीब चार इंच लंबे होते हैं. सबसे लंबा है रेटिकुलेटेड पाइथन, जो करीब 20 फुट लंबा है. तितानोबोआ सबसे लंबा सांप था जो करीब 43 फुट लंबा था, लेकिन अब लुप्त हो चुका है.

स्टोनी ब्रूक विश्वविद्यालय के इवोल्यूशनरी जीव-वैज्ञानिक और अध्ययन के मुख्य लेखक पास्कल टाइटल का कहना है, “आपको लगता होगा कि सांप तो बस सांप ही है. लेकिन पेड़ों में रहने वाले सांप पानी में रहने वाली सांपों से बिलकुल अलग दीखते हैं और मिटटी में रहने वाले सांप उनसे अलग, आदि आदि.”

सांपों की मौजूदा 3,900 प्रजातियों की इकोलॉजिकल विविधता अद्भुत है. पैडल के जैसी दुम वाले सांप मूंगे की चट्टानों की दरारों में से निकाले गए मछली के अंडे खाते हैं. पेड़ों में रहने वाले कुछ सांपों के पास घोंघों को उनके खोल में से निकालने के लिए विशेष जबड़े होते हैं. ऐसे सांप खास रसायनों का इस्तेमाल कर इन घोंघों को ऊपर जमे लसलसीलेपन को भी हटाते हैं.

कुछ बोआ गुफाओं में लटके चमगादड़ों का शिकार करते हैं. कुछ सांप मेंढकों के अंडे, केचुए या चिड़ियों के अंडे खाने में माहिर होते हैं. कुछ तो दूसरे सांपों को ही खा जाते हैं. कुछ लोगों को सांपों से डर लगता है. लेकिन इन शोधकर्ताओं को नहीं.

पाइरॉन कहते हैं, “इनके चलने के तरीके से लेकर इनके इकोसिस्टम के साथ पेश आने के इनके तरीके हों, इनके बारे में सब कुछ अद्भुत है. यह सुंदर हैं, आकर्षक हैं और अधिकांश रूप से हानिकारक नहीं हैं.”

सीके/एए (रॉयटर्स)

भारत: कैसे एक महिला संगठन के सवालों से सीख रहा है एक स्वास्थ्य एआई चैटबॉट

स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल की कई संभावनाएं हैं. भारत में एक फाउंडेशन महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी सटीक जानकारी देने वाले एक एआई चैटबॉट को बनाने की कोशिश कर रहा है.कोमल विलास तटकरे कहती हैं कि उनके पास ऐसा कोई नहीं है जिससे वो अपने सबसे निजी स्वास्थ्य संबंधी सवाल पूछ सकें. वो 32 साल की हैं और एक गृहिणी और मां हैं.

उन्होंने बताया, "मेरे घर में सिर्फ मर्द हैं. कोई और औरत नहीं है. मैं यहां किसी से बात नहीं करती. इसलिए मैं मैंने इस ऐप का इस्तेमाल किया क्योंकि यह मेरी निजी समस्याओं को सुलझाने में मेरी मदद करता है."

जिस ऐप की वो बात कर रही हैं वह ओपनएआई के चैटजीपीटी मॉडल पर चलने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐप है. इसे एक स्थानीय महिला संगठन 'मैना महिला फाउंडेशन' बना रही है.

तटकरे 'मैना बोलो' चैटबॉट से सवाल पूछती हैं और वह जवाब देता है. इसे बातचीत के जरिए तटकरे को एक गर्भ-निरोधक गोली के बारे में और उसे कैसे लेना है पता चला. वो उन 80 टेस्ट यूजरों में से हैं जिन्हे इस संस्था ने चैटबॉट के प्रशिक्षण में मदद करने के लिए भर्ती किया है.

प्रजनन संबंधी विषयों पर जानकारी

चैटबॉट के पास यौन स्वास्थ्य से जुड़ी मेडिकल जानकारी का एक कस्टमाइज्ड डाटाबेस है लेकिन इसकी सफलता तटकरे जैसे टेस्ट यूजरों से मिले प्रशिक्षण पर निर्भर करती है. चैटबॉट इस समय एक पायलट परियोजना है लेकिन वह दुनियाभर में स्वास्थ्य पर एआई के असर को लेकर उस उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है जो कई लोगों को है.

उम्मीद यह है कि आने वाले समय में एआई अलग अलग लोगों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में उनके अनुकूल सटीक मेडिकल जानकारी दे पाएगा और क्लिनिक या प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों से कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंच पाएगा.

प्रजनन संबंधी विषयों पर चैटबॉट के ध्यान देने की वजह से ऐसी जरूरी जानकारी भी मिल सकती है जिसे सामाजिक मानकों की वजह से और कहीं पर ढूंढना मुश्किल है.

मैना महिला फाउंडेशन की संस्थापक और सीईओ सुहानी जलोटा कहती हैं, "अगर यह वाकई महिलाओं को यह गैर-आलोचनात्मक, निजी सलाह दे पाएगा तो यह यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में जानकारी हासिल करने में क्रांतिकारी हो सकता है."

फाउंडेशन को इस चैटबॉट को विकसित करने के लिए पिछले साल बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से करीब 82 लाख रुपयों का अनुदान मिला. गेट्स फाउंडेशन, पैट्रिक जे मैकगवर्न फाउंडेशन और डाटा डॉट ओआरजी जैसी फंडिंग संस्थाएं विशेष रूप से स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में समुदायों की भलाई के लिए एआई के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही हैं.

अभी काफी काम बाकी है

मैना महिला फाउंडेशन ने तटकरे जैसे टेस्ट यूजरों को भर्ती किया ताकि वे अपने असली सवाल लिख सकें. जैसे, "क्या कंडोम के इस्तेमाल से एचआईवी हो सकता है?" या "क्या मैं माहवारी के दौरान सेक्स कर सकती हूं?"

फाउंडेशन का स्टाफ उसके बाद चैटबॉट की प्रतिक्रियाओं को करीब से मॉनिटर करता है और सत्यापित सवालों और जवाबों का डाटाबेस बनाता है जो आगे आने वाली प्रतक्रियाओं को बेहतर बनाने में मदद करता है.

यह चैटबॉट अभी व्यापक इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं है. जलोटा ने बताया कि इसकी प्रतिक्रियाओं की सटीकता अभी बहुत अच्छी नहीं है और इसके अनुवाद में भी समस्याएं हैं. यूजर अक्सर सवाल एक से ज्यादा भाषाओं में लिखते हैं और हो सकता है कि वो चैटबॉट को प्रासंगिक प्रतिक्रिया देने में मदद करने के लिए पर्याप्त जानकारी ना दे रहे हों.

जलोटा ने यह भी बताया, "हम अभी तक पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं कि महिलाएं सब कुछ स्पष्ट समझ पा रही हैं या नहीं और जो भी जानकारी हम दे रहे हैं वह पूरी तरह से चिकित्सा की दृष्टि से सटीक है या नहीं."

अमेरिका के यूसी सान डिएगो हेल्थ के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर क्रिस्टोफर लॉन्गहर्स्ट ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल की परियोजनाओं का नेतृत्व किया है. उनका कहना है कि नए टूल्स के मरीजों पर असर को मापने और उसका परीक्षण करना जरूरी है.

उन्होंने बताया, "हम बस यह मान नहीं सकते या बस भरोसा या उम्मीद नहीं कर सकते कि ये चीजें अच्छी ही होंगी. आपको वाकई उन्हें टेस्ट करना होगा."

उन्हें यह भी लगता है कि अगले दो से तीन सालों में स्वास्थ्य में एआई की संभावनाओं को काफी ज्यादा आंका जा रहा है. लेकिन उन्हें लगता है कि "अगले एक दशक में एआई स्वास्थ्य क्षेत्र में इतना असरदार हो जाएगा जितना पेनिसिलिन का लाया जाना था."

सीके/एए (एपी)

FDI Policy in Space Sector: मोदी सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एफडीआई पॉलिसी को दी मंजूरी, जानें इससे कैसे होगा फायदा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति में संशोधन को मंजूरी दे दी है. इस संशोधन के तहत उपग्रह उप-क्षेत्र को तीन अलग-अलग गतिविधियों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक में विदेशी निवेश की सीमा निर्धारित की गई है.

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 को अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाकर भारत की क्षमता को उजागर करने के लिए एक व्यापक, समग्र और गतिशील ढांचे के रूप में अधिसूचित किया गया था. इस नीति का लक्ष्य अंतरिक्ष क्षमताओं को बढ़ाना, अंतरिक्ष में एक संपन्न वाणिज्यिक उपस्थिति विकसित करना, अंतरिक्ष का उपयोग प्रौद्योगिकी विकास और संबद्ध क्षेत्रों में प्राप्त लाभों के लिए करना, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आगे बढ़ाना और सभी हितधारकों के बीच अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है.

संशोधन के मुख्य बिंदु

उपग्रह उप-क्षेत्र का विभाजन: इस उप-क्षेत्र को अब तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

  • उपग्रह निर्माण (निर्माण और संचालन दोनों)
  • उपग्रह संचालन (केवल संचालन)
  • अंतरिक्ष आधारित सेवाएं (उपग्रहों का उपयोग करके प्रदान की जाने वाली सेवाएं)

विदेशी निवेश की सीमाएं: प्रत्येक श्रेणी के लिए विदेशी निवेश की सीमा अलग-अलग निर्धारित की गई है. उदाहरण के लिए, उपग्रह निर्माण में विदेशी निवेश की सीमा 74% तक हो सकती है, जबकि उपग्रह संचालन में यह सीमा 100% तक हो सकती है.

निजी क्षेत्र को बढ़ावा: यह संशोधन निजी क्षेत्र को अंतरिक्ष क्षेत्र में अधिक निवेश करने और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करेगा.

इस संशोधन के लाभ

अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रौद्योगिकी और निवेश में वृद्धि: विदेशी निवेश से अंतरिक्ष क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकियों और पूंजी के प्रवाह को बढ़ावा मिलेगा.

रोजगार सृजन: अंतरिक्ष क्षेत्र में अधिक निवेश से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

अंतरिक्ष अनुप्रयोगों का विकास: यह संशोधन अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के विकास को गति देगा, जिससे विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, संचार और आपदा प्रबंधन में लाभ होगा.

यह संशोधन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को मजबूत बनाने और अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

क्या है लॉकबिट जिसने पूरी दुनिया में कोहराम मचाया

इस हफ्ते पुलिस बलों ने साइबर अपराधियों का एक गैंग लॉकबिट का सफाया करने का दावा किया है. क्या है लॉकबिट जिसने दुनियाभर में तबाही मचा रखी थी?अमेरिकी पुलिस ने दावा किया है उसने लॉकबिट गैंग को तोड़ दिया है. लॉकबिट हैकरों का वही गैंग है जिसने पिछले कुछ समय में दुनिया की कई बड़ी-बड़ी कंपनियों पर साइबर हमले किए और धन व संवेदनशील जानकारी चुराकर फिरौती की मांग की थी. इस गैंग ने बड़े पैमाने पर डेटा लीक किया और कई कंपनियों को नुकसान भी पहुंचाया.

लॉकबिट का पता 2020 में चला था जब साइबर अपराधियों के रूसी भाषा के कई अड्डों पर इसका मालवेयर पाया गया. मंगलवार को अमेरिकी अधिकारियों ने दो रूसी नागरिकों को कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर लॉकबिट रैंसमवेयर से हमला करने का आरोपी बनाते हुए मुकदमा दर्ज किया है. पोलैंड और यूक्रेन में भी स्थानीय पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है.

इस गैंग ने किसी सरकार का समर्थन कभी नहीं किया. अब बंद हो चुकी एक डार्कवेब साइट पर इस गैंग ने कहा था, "हम नीदरलैंड्स से काम करते हैं. हम पूरी तरह अ-राजनीतिक हैं और हमारी दिलचस्पी सिर्फ पैसे में है.”

दुनियाभर में हमले

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सिर्फ तीन साल में यह गैंग इंटरनेट पर साइबर हमले कर फिरौती मांगने वाला सबसे बड़ा खतरा बन गया था. सबसे ज्यादा नुकसान तो इसने अमेरिका में ही किया. वहां सरकारी विभागों से लेकर हर क्षेत्र की निजी कंपनियों तक इसने कुल मिलाकर 1,700 संगठनों पर हमले किए. इनमें बैंकों से लेकर स्कूल, परिवहन और खाद्य सेवाएं तक शामिल हैं.

इसके हमले झेलने वालों में रक्षा और विमानन क्षेत्र की कंपनी बोइंग भी है. पिछले साल नवंबर में लॉकबिट ने बोइंग पर हमला करके उसका डेटा चुराया और उसे सार्वजनिक कर दिया. इससे पहले फाइनैंशल ट्रेडिंग ग्रुप इयॉन (ION) पर भी हमला हुआ था और उसका कामकाज प्रभावित हुआ था. इयॉन के ग्राहकों में दुनिया के सबसे बड़े बैंक और हेज फंड शामिल हैं.

लॉकबिट ने इंडस्ट्रियल एंड कमर्शल बैंक ऑफ चाइना (ICBC) और अमेरिकी वित्त मंत्रालय को भी निशाना बनाया है. भारत तो सबसे ज्यादा हमलों का शिकार होने वाले देशों मे ंदूसरे नंबर पर है.

इस गैंग के लोग अपने रैंसमवेयर को शिकार संस्थान के कंप्यूटर नेटवर्क में फैला देते हैं, जिससे उस नेटवर्क का पूरा डेटा लॉक हो जाता है. उसके बाद ये अपराधी डेटा अनलॉक करने के लिए फिरौती की मांग करते हैं. अक्सर यह फिरौती क्रिप्टोकरंसी के रूप में मांगी जाती है, जिसे पकड़ पाना ज्यादा मुश्किल है.

अमेरिका समेत 40 देशों के अधिकारियों का एक संगठन इस गैंग को पकड़ने की कोशिश में लगा था. इसके लिए सभी देश साइबर अपराधियों के क्रिप्टोकरंसी वॉलेट से जुड़ी सूचनाएं एक दूसरे से साझा कर रहे थे.

ब्लॉग पर चेतावनी

डार्क वेब पर लॉकबिट का एक ब्लॉग है जहां उन तमाम संस्थाओं और संगठनों की सूची दी गई है, जिन्हें इस गैंग ने निशाना बनाया. इस सूची में लगभग रोज नया नाम जोड़ा जाता था. उनके नाम के साथ एक घड़ी भी है, जिसका वक्त बताता है कि किस संगठन के पास फिरौती देने के लिए कितना वक्त बचा है.

अक्सर निशाना बनी कंपनियां हमला होने के बाद साइबर सुरक्षा कंपनियों से संपर्क करती हैं ताकि पता चले कि किस तरह का और कितना डेटा चुराया गया है. उसके आधार पर फिरौती की मांग पर मोलभाव भी होता है. अक्सर मोलभाव की यह बातचीत निजी स्तर पर होती है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जाता. सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इसमें कई दिन से लेकर कई हफ्ते का समय भी लग सकता है.

अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए लॉकबिट कथित सहयोगियों की मदद लेता है. ये सहयोगी उसी तरह की अन्य गतिविधियों में लिप्त अपराधी संगठन होते हैं. अपने ब्लॉग पर लॉकबिट ने साइबर अपराधियों को अपने साथ काम करने का न्योता भी दे रखा है. इसके लिए बाकायदा एक एप्लिकेशन फॉर्म दिया गया है और साथ में नियम-कायदे भी लिखे हैं. एक नियम है, "अपने उन दोस्तों या परिचितों से हमारे बारे में पूछिए, जो पहले से हमारे साथ काम कर रहे हैं. वही आपकी गारंटी देंगे.”

वीके/एए (रॉयटर्स)

AstroSat: अंतरिक्ष में भारतीय जासूस! ISRO के एस्ट्रोसैट ने ब्लैक होल के रहस्य से पर्दा उठाया, जानें MAXI J1820+070 की कहानी

AstroSat: A Multi-Wavelength Marvel : क्या आपने कभी अंतरिक्ष में रहने वाले रहस्यमयी ब्लैक होल के बारे में सुना है? आज हम आपको एक भारतीय उपग्रह की कहानी बताएंगे, जिसने एक ऐसे ही एक ब्लैक होल के राज खोलने में मदद की है!

इस कहानी का नायक है हमारा अपना अंतरिक्ष यान एस्ट्रोसैट. आस्त्रसैट खास है क्योंकि वो एक ही समय में कई तरह की रोशनी (Wavelength) को देख सकता है. जैसे इंसान इंद्रधनुष के अलग-अलग रंग देखता है, वैसे ही आस्त्रसैट भी आसमान के अलग-अलग रंगों (Wavelength) को देखकर अंतरिक्ष की वस्तुओं को समझता है.

MAXI J1820+070: ब्लैक होल

आज हम जिस ब्लैक होल की बात करेंगे, उसका नाम है MAXI J1820+070. यह करीब 9800 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है और बहुत ही खास है. 2018 में इसने अचानक चमकना शुरू कर दिया, जैसे कोई तेज रोशनी वाला दीपक जला दिया हो! इस वजह से दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान इस ब्लैक होल की ओर गया.

आस्त्रसैट की जासूसी

MAXI J1820+070 के रहस्य को सुलझाने में एस्ट्रोसैट ने अहम भूमिका निभाई. एस्ट्रोसैट की खासियत है कि वो X-Ray, UV और सामान्य रोशनी को देख सकता है. इस तरह उसने MAXI J1820+070 के आसपास के इलाकों को अलग-अलग रोशनी में देखा, मानो जासूसी कर रहा हो!

ब्लैक होल के मूड स्विंग

आपको जानकर हैरानी होगी कि ब्लैक होल भी अपना मूड बदलते रहते हैं! कभी वो ज्यादा खाते हैं, तो कभी कम. जब वो ज्यादा खाते हैं (चीजो को अंदर खींचते हैं) तो उन्हें हार्ड स्टेट कहते हैं, और कम खाते हैं तो उसे सॉफ्ट स्टेट कहते हैं. आस्त्रसैट ने देखा कि MAXI J1820+070 भी इन दोनों मूड में स्विंग करता था. हार्ड स्टेट में वो ज्यादा X-Ray छोड़ता था, और सॉफ्ट स्टेट में कम. इस तरह एस्ट्रोसैट ने बताया कि MAXI J1820+070 का मूड कैसा है और वो कितना खा रहा है!

रोशनी का नाटक

एस्ट्रोसैट ने ये भी पता लगाया कि ब्लैक होल के आसपास और दूर इलाकों में भी रोशनी का अपना नाटक चल रहा है. ब्लैक होल के पास जो रोशनी निकलती है, वो उससे दूर जाकर दूसरी तरह की रोशनी बन जाती है. आस्त्रसैट ने इस रोशनी के नाटक को भी समझा, जिससे वैज्ञानिकों को MAXI J1820+070 के बारे में और भी जानकारी मिली.

आखिर में…

एस्ट्रोसैट का यह शोध बहुत महत्वपूर्ण है. इससे न सिर्फ MAXI J1820+070 के बारे में जानकारी मिली, बल्कि ये बताया कि अंतरिक्ष में और भी ऐसे ब्लैक होल हो सकते हैं, जिनके बारे में हम नहीं जानते. एस्ट्रोसैट जैसे शक्तिशाली उपग्रहों की मदद से हम भविष्य में और भी ज्यादा रहस्यों को खोल पाएंगे!

जिसे मामूली तारा समझा, वह निकला एक दैत्याकार हिंसक पिंड

वैज्ञानिकों ने जिसे कभी एक मामूली सितारा समझा था वह आकाश का अब तक का सबसे चमकदार पिंड था. इसकी ताकत इंसानी कल्पनाओं की सारी सीमाओं के पार है.खगोलविदों ने आकाश में एक पिंड खोजा है जो ब्रह्मांड की शायद सबसे चमकती हुई चीज है. यह एक नाभिकीय पिंड है जिसके भीतर एक विशाल ब्लैक होल है. यह ब्लैक होल इतनी तेजी से बड़ा हो रहा है कि रोजाना एक सूरज जितना बड़ा हिस्सा निगल जाता है.

यह आकाशीय पिंड हमारे सूर्य से 500 खराब गुना ज्यादा चमकीला है. ब्लैक होल के कारण इसकी ऊर्जा हमारे सूर्य से 17 अरब गुना ज्यादा है. ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक दल ने इसकी खोज की है. यह शोध साइंस पत्रिका ‘नेचर एस्ट्रोनॉमी' में प्रकाशित हुआ है.

भयावह जगह

पृथ्वी से ली गईं तस्वीरों में तो यह चमकता हुआ सितारा सिर्फ एक छोटा सा बिंदु भर नजर आता है लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक बेहद भयावह जगह है.

यह एक घूमती हुई चक्की जैसा है जिसके भीतरी हिस्से में चमकदार गैसें और अन्य सितारें हैं जिन्हें ब्लैक होल निगल चुका है. वैज्ञानिक कहते हैं कि यह एक आकाशीय चक्रवात जैसा है.

बेहद विशालकाय ब्लैक होल आकाशगंगाओं के केंद्र में होते हैं और अपनी विशाल गुरुत्वाकर्षण शक्ति से सितारों को धूल के कणों की तरह निगल जाते हैं. प्रकाश भी इनकी शक्ति से बच नहीं पाता.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के क्रिस्टियान वॉल्फ इस शोध के मुख्य शोधकर्ता हैं. वह बताते हैं, "अब तक हम जितने भी आकाशीय पिंडों को जानते हैं, उनमें से यह सबसे हिंसक जगह है.”

अब तक समझा सितारा

वैसे सबसे पहले इस पिंड को यूरोपीयन सदर्न ऑब्जर्वेटरी ने 1980 में आसमान के एक सर्वे के दौरान खोजा था. इसे J0529-4351 नाम दिया गया. तब वैज्ञानिकों ने इसे एक सितारा ही समझा था. लेकिन पिछले साल मिली जानकारियों ने इस सितारे को लेकर वैज्ञानिकों में नई उत्सुकता पैदा की.

ऑस्ट्रेलिया और चिली में स्थापित अत्यधिक शक्तिशाली दूरबीनों से इसका अध्ययन किया गया. येल यूनिवर्सिटी की प्रियंवदा नटराजन इस शोध में शामिल नहीं थीं. वह कहती हैं, "इस आकाशीय पिंड के बारे में सबसे मजेदार बात यह है कि यह हमारे सामने ही मौजूद था और हम इसे सितारा समझते रहे.”

यह आकाशीय पिंड पृथ्वी से 12 अरब प्रकाश वर्ष दूर है जो करीब 5.8 खरब मील बनता है. इसका जन्म ब्रह्मांड के जन्म के आसपास ही हुआ होगा.

इस चमकदार आकाशीय पिंड के बारे में जो जानकारियां मिली हैं, वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडलिंग के जरिए उनका विश्लेषण किया है. उन्होंने पाया कि हर साल हमारे सूर्य के बराबर आकार के करीब 370 सितारे इसके गर्भ में समाते जा रहे हैं, यानी औसतन रोजाना एक सूरज. इसके गर्भ में जितना भार जमा हो गया है, वह हमारे सूरज से 17 से 19 अरब गुना ज्यादा है.

वीके/एए (एपी)

CoronaVirus : सिरदर्द, याददाश्त की समस्या और थकान का कारण सिर्फ कोरोना नहीं: स्टडी

लंदन : एक नई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सिरदर्द, याददाश्त की समस्या और थकान सूजन के कारण भी हो सकता है. ऐसा जरूरी नहीं है कि यह सब लक्षण कोरोना वायरस से ही हो. दरअसल, इस अध्ययन की प्रासंगिकता इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि बीते दिनों यह दावा किया गया था कि कोरोना से ठीक हुए लोगों में सिरदर्द, याददाश्त की समस्याएं और थकान जैसे लक्षण देखने को मिल सकते हैं.

महामारी की शुरुआत में शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि मस्तिष्क का सीधा संक्रमण इन न्यूरोलॉजिकल लक्षणों के पीछे का कारण हो सकता है. कई शोधों में ब्रेन पर भी कोविड का असर देखने को मिला है, लेकिन जर्मनी में चैरिटे-यूनिवर्सिटैट्समेडिज़िन बर्लिन के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन ने अब नए सिद्धांत का समर्थन करने के लिए सबूत पेश किए हैं.

चैरिटे में न्यूरोपैथोलॉजी विभाग में क्रॉनिक न्यूरोइन्फ्लेमेशन वर्किंग ग्रुप की प्रमुख डॉ. हेलेना रैडब्रुच ने कहा, “हमने शुरुआत में भी इसे अपनी परिकल्पना के रूप में लिया था. लेकिन अब तक इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है कि कोरोना वायरस मस्तिष्क में बना रह सकता है, फैलने की तो बात ही छोड़िए.”

रैडब्रुच ने कहा, “इसके लिए उदाहरण के लिए हमें मस्तिष्क में अक्षुण्ण वायरस कणों के साक्ष्य खोजने की आवश्यकता होगी. इसके बजाय, यह संकेत कि कोरोना वायरस मस्तिष्क को संक्रमित कर सकता है, अप्रत्यक्ष परीक्षण विधियों से आते हैं, इसलिए वे पूरी तरह से निर्णायक नहीं हैं.”

दूसरी परिकल्पना के अनुसार, न्यूरोलॉजिकल लक्षण वायरस से बचाव के लिए शरीर द्वारा तैनात मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का एक प्रकार का दुष्प्रभाव होगा.

अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं की टीम ने 21 लोगों के मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों का विश्लेषण किया, जिनकी मृत्यु गंभीर कोरोना वायरस संक्रमण के कारण अस्पताल में आईसीयू में हुई थी. तुलना के लिए, शोधकर्ताओं ने नौ रोगियों का अध्ययन किया, जिनकी गहन देखभाल में इलाज के बाद अन्य कारणों से मृत्यु हो गई.

सबसे पहले, उन्होंने यह देखा कि क्या ऊतक में कोई दृश्य परिवर्तन दिखाई दे रहा है और कोरोना वायरस के किसी भी संकेत की तलाश की गई. फिर उन्होंने व्यक्तिगत कोशिकाओं के अंदर होने वाली विशिष्ट प्रक्रियाओं की पहचान करने के लिए जीन और प्रोटीन का विस्तृत विश्लेषण किया.

अपने से पहले शोधकर्ताओं की अन्य टीमों की तरह चैरिटे वैज्ञानिकों ने कुछ मामलों में मस्तिष्क में कोरोना वायरस आनुवंशिक सामग्री पाई.

रैडब्रुच ने कहा, “लेकिन हमें कोविड से संक्रमित न्यूरॉन्स नहीं मिले. हम मानते हैं कि प्रतिरक्षा कोशिकाएं शरीर में वायरस को अवशोषित करती हैं और फिर मस्तिष्क तक पहुंचती हैं. उनमें अभी भी वायरस मौजूद है, लेकिन यह मस्तिष्क की कोशिकाओं को संक्रमित नहीं करता है, इसलिए कोरोना वायरस ने शरीर की अन्य कोशिकाओं पर तो आक्रमण किया है, लेकिन मस्तिष्क पर नहीं.”

शोधकर्ताओं ने कोविड-19 से संक्रमित लोगों के मस्तिष्क की कुछ कोशिकाओं में आणविक प्रक्रियाओं में आश्चर्यजनक बदलावों पर ध्यान दिया. उदाहरण के लिए, कोशिकाओं ने इंटरफेरॉन सिग्नलिंग मार्ग को तेज कर दिया, जो आमतौर पर वायरल संक्रमण के दौरान सक्रिय होता है.

बर्लिन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एट चैरिटे (बीआईएच) में इंटेलिजेंट इमेजिंग वर्किंग ग्रुप के प्रमुख और अध्ययन में प्रमुख जांचकर्ताओं में से एक प्रोफेसर क्रिश्चियन कॉनराड ने कहा, “कुछ न्यूरॉन्स स्पष्ट रूप से शरीर के बाकी हिस्सों में सूजन पर प्रतिक्रिया करते हैं.”

यह आणविक प्रतिक्रिया उन न्यूरोलॉजिकल लक्षणों के लिए एक अच्छा स्पष्टीकरण हो सकती है, जो हम कोविड -19 रोगियों में देखते हैं.उदाहरण के लिए, मस्तिष्क तंत्र में इन कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जित न्यूरोट्रांसमीटर थकान का कारण बन सकते हैं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि मस्तिष्क कोशिकाओं के समूहों का घर है, जो ड्राइव, प्रेरणा और मनोदशा को नियंत्रित करते हैं.

इसके अलावा टीम ने पाया कि सूजन के प्रति न्यूरॉन्स की प्रतिक्रिया अस्थायी है, जैसा कि तीव्र कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान मरने वाले लोगों और कम से कम दो सप्ताह बाद मरने वाले लोगों की तुलना से पता चलता है. तीव्र संक्रमण चरण के दौरान आणविक परिवर्तन सबसे अधिक स्पष्ट होते हैं, लेकिन बाद में वे फिर से सामान्य हो जाते हैं.

VIDEO: ‘ शरारती बालक’ अब स्मार्ट हो गया है, INSAT-3DS की लॉन्चिंग पर बोले ISRO वैज्ञानिक

श्रीहरिकोटा : देश के तीसरी पीढ़ी के मौसम उपग्रह इनसैट-3डीएस की शनिवार को सफल लॉन्चिंग के बाद जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) रॉकेट में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के वैज्ञानिकों का विश्वास बढ़ गया है.

जीएसएलवी रॉकेट (पूर्व में जीएसएलवी-एमकेII) को शुरुआती दिनों में उसके प्रदर्शन में अनिश्चितता के लिए ‘शरारती बालक’ का उपनाम मिल गया था.

इसरो के अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने कहा, “जीएसएलवी रॉकेट पर भरोसा अब बहुत अधिक है.”

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उन्होंने कहा कि जीएसएलवी रॉकेट का अगला मिशन भारत-अमेरिका के संयुक्त पृथ्वी अवलोकन उपग्रह नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार (एनआईएसएआर) का प्रक्षेपण होगा.

सोमनाथ सहित इसरो के तमाम अधिकारियों ने शनिवार को ‘शरारती बालक’ की खूब तारीफ की.

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) के निदेशक एस. उन्नीकृष्णन ने कहा कि ‘शरारती बालक’ अब स्मार्ट हो गया है और मिशन से जुड़ी हर चीज सुचारू रूप से चल रही है.

 

शनिवार को प्रक्षेपित जीएसएलवी-एफ4 मिशन के निदेशक टॉमी जोसेफ ने कहा, “शरारती बालक परिपक्व हो गया है और अब एक अनुशासित लड़का बन गया है. रॉकेट ने उपग्रह को उसकी इच्छित कक्षा में पहुंचा दिया.”

जोसेफ ने यह भी कहा कि रॉकेट पिछले मिशन की तुलना में 50 किलोग्राम अधिक वजन ले गया था.

उपग्रह निदेशक इम्तियाज अहमद के अनुसार, चार मीटर व्यास वाला हीट शील्ड महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बड़े उपग्रह बनाने का विकल्प देता है.

तरल प्रणोदन प्रणाली केंद्र के निदेशक वी.नारायणन ने कहा कि रॉकेट की पेलोड क्षमता पहले लगभग 1,500 किलोग्राम से बढ़कर अब 2,274 किलोग्राम हो गई है – जो कि इनसैट-3डीएस उपग्रह का वजन है. यू.आर. राव उपग्रह के निदेशक एम. शंकरन के अनुसार, कक्षा हासिल करने के कारण इनसैट-3डीएस का जीवन काल अब तीन महीने बढ़कर 10 साल हो गया है.

सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक ए. राजराजन ने कहा कि प्रक्षेपण अभियान बिना किसी रुकावट के चला और केंद्र अगले रॉकेट प्रक्षेपण के लिए तैयारी कर रहा है.

 

आसमान को चीरते हुए अंतरिक्ष में पहुंचा ISRO का नॉटी बॉय, देखें INSAT-3DS सैटेलाइट की लॉन्चिंग का वीडियो

आंध्र प्रदेश: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल एफ14 (GSLV-F14) के जरिए मौसम वैज्ञानिक उपग्रह आईएनएसएटी-3डीएस  (INSAT-3DS) को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया है.

देखें INSAT-3DS सैटेलाइट की लॉन्चिंग का वीडियो

क्यों मिला नॉटी बॉय नाम?

इसरो के मुताबिक, GSLV रॉकेट से यह 16वां मिशन है. इससे पहले 15 मिशनों को अंजाम दिया जा चुका है, जिनमें से सिर्फ चार मिशन ही फेल हुए हैं. GSLV रॉकेट की सफलता दर को देखते हुए ही इसे नॉटी बॉय नाम मिला है.

  • INSAT-3DS उपग्रह की विशेषताएं: इसका वजन 2,274 किलोग्राम है और इसका मिशन जीवन 10 साल है. यह उपग्रह 10 वर्षों तक मौसम में होने वाले हर बदलाव की सटीक जानकारी इसरो को प्रदान करता रहेगा.
  • लागत और निर्माण: इसकी कुल लागत 480 करोड़ रुपये है.
  • कक्षा और कार्यक्षेत्र: पीएसएलवी रॉकेट के माध्यम से प्रक्षेपण के 18 मिनट बाद, INSAT-3DS उपग्रह को 36,647 किमी x 170 किमी की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में स्थापित हो गया. यह पहले लॉन्च किए गए उपग्रहों का तीसरा संस्करण है.
  • उपग्रह की क्षमताएं: यह उपग्रह, एक बार चालू हो जाने के बाद, जमीन और समुद्र दोनों पर उन्नत मौसम की जानकारी प्रदान करने में सक्षम होगा. इसके माध्यम से तूफान जैसी चरम मौसम घटनाओं का पता लगाया जा सकेगा. इसके अलावा, जंगल की आग, बर्फ की चादर, धुआं और बदलते जलवायु के बारे में भी जानकारी उपलब्ध होगी.